नूर
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मेरी घर की किताबें
उनके साथ - साथ
मेरी किताबी बातें
पन्ने एक - एक कर
हवाओं में ख़ुशबू जैसे घुल जाते
शहद में डूबे शब्द
हर तने रिश्ते को मोम्ब से पिघलाते
सुराही में डुबकियाँ लगा रही मेरी नज़्म
दूर मीठे पानी में पनपते मेरे मन के भरम
घर के अंदर बैठे सारे आधे-अधूरे ख़्वाब
बस किताबें हीं सहलाते हैं भीतर के घाव
अब पूछते हैं मुसाफ़िर, नूर-ए-एहसास
अमृता क्या यही है किताब-ए-महताब !
आपकी अमृता
28 नवम्बर, दो हज़ार पच्चीस
