मैं तुमसे फिर मिलूँगी ……
सपने समंदर की लहरों में
जब हर उम्मीद डूब जाए
सूरज की गर्मी से भी गर्म आग में
जब हर ख़ुशी झुलस जाये
सूने- सूने आँखों में
जब हर दर्द बर्फ बन जाये
काली उमस भरी रातों में
जब एक भी तारा ना टिमटिमाये
जीवन के खोखले चक्र में
जब वक्त जज़्बात से गुज़र जाये
उस रोज़ आवाज़ और खामोशी के बीच
समय के दायरे और
समाज के मोहर के बिना
मैं तुमसे फिर मिलूँगी …..
तुम्हारी अमृता
3 दिसंबर , दो हज़ार पच्चीस
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