Image Source: https://www.unccd.int/land-and-life/sand-dust-storm/overview
बार - बार क्यों याद आता है , वो जो पीछे छूट गया?
क्यों सारा ध्यान, सुख, शांति, आराम उसी याद के चिंतन और मनन में है?
क्या है उसके पीछे के राज?
जैसे - जैसे हम आगे बढ़ते जाते हैं,
वैसे -वैसे पीछे जाने की चाहत और तीव्र हो जाती है। कुछ पुराना हिसाब चुकाना हो जैसे।
वो जो अब यहाँ नहीं है, वो भी अभी यहीं है। उनकी चाहत, उनकी हिम्मत, उनकी नियत, उनकी ताक़त ! सब जैसे हमारे अंदर समा जाती है और हमें आवाज़ देती है, कि रुको ….
एक लंबी साँस लो,
सब्र करो। हौसला रखो ।
यादों में अपनी पहचान बनाना एक अनोखा एहसास है। यहाँ कोई नहीं जानता कि तुम कौन हो ? क्या है तुम्हारी अहमियत? क्या है तुम्हारी औक़ात?
यहाँ बस दूर- दूर तक एक लंबी पगडण्डी है….
चलते - चलते वो याद हमें अपनी ओर खींचती है, जैसे ठीक उसी मोड़, गली, मुहल्ले, पगडण्डी में, मैं अब भी ज़िंदा हूँ।
धूल, हवा, आवाज़ और कभी रात का सन्नाटा हूँ ।
सब मैं हीं हूँ ….
आपकी अमृता
29 मार्च, 2026

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