Saturday, 8 February 2025

फ़र्ज़

 फ़र्ज़ 


एक तजुर्बा फ़र्ज़ का, 

एक सदी क़ुर्बानी की 

बिना दलील - रोज़ वक़ालत, 

एक ज़िंदा ख़ामोश ज़िंदगी

सुखी स्याही पूछे अधूरे अरमानों से 

कहाँ खो गया ख़्वाबों का क़िला 

जहाँ कई चाँद थे सरे आसमाँ ?

अब क़र्ज़ के बाज़ार में 

सब हैं तोलते-मोलते 

कभी किश्तों में बाटें रिश्तें, 

कभी रिश्तों में किस्तें 

क्या क्या अरमानों से सजाया था 

ये सपनों का जहाँ 

पिरोई थीं इनमें कभी मैंने 

गुलाबों की पंखुड़ियाँ 

अब फ़र्ज़ के तले कहीं पड़ीं हैं 

मेरी परछाइयाँ 


आपकी अमृता 

23 सितम्बर, 2024

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